दोस्ती

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 आज पुरानी राहों से फिर एक बार आ गुजरी थी, 
तेरे साथ बिताए उन पलों को दिल में लेकर कुछ देर ठहरी थी
आस अब तलक सीने में यूँ ही जल रही थी,
तुम लौट के आ जाओगे यारा इसी तवक्कों में जी रही थी।
चाय की वो टपरी भी अब वीरान सी लगने लगी,
जहाँ अपनी दोस्ती की नींव यारा मकबूल हुई।
अंजान उन राहों में तेरे कंधे पर सिर रखने वाला हमसा कोई और न था,
पहले कभी तेरी बाइक की पिछली सीट पर मानो सिर्फ मेरा ही कब्जा था।
याद है यारा जब तुझ पर वार जाने को दिल किया करता था,
छोड़ दिया हाथ तूने पर फिर भी हाथ थामने को दिल किया करता था।
तेरा यूँ मुझे अनदेखा करना ए दोस्त एक बहाना सा लगता था,
कोई तदबीर न सूझती दिल में जब तमन्ना तुझे पाने को करता था।
यूँ की तूने मेरे एहसासों की नुमाइश कर फिर कभी इजाजत न दी दिल लगाने की,
रफ्ता रफ्ता तेरी साझेदारी भी आमदा हो गई तोहमत लगा दोस्ती न निभाने की।
वो जमाना भी बीत गया जब हम दोस्ती ताउम्र निभाने की कस्में खाया करते थे,
तुम इतना कैसे बदल गए यारा की मेरी धड़कन की धङक को न पाया करते थे।
ऐ दोस्त जिंदगी भर तेरी दोस्ती के यूँ ही तलबगार रहेंगे,
जब तक यूँ ही कुरबत के आबशार बहेंगे ।
मुझे आज भी अकीदा है तेरे लौट के आने की ,
हया़त के कायदे से मिलकर एक नए खुल्द बनाने की ॥

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